मैथिली शरण गुप्त की कविता में राष्ट्र प्रेम की भावना भरी है : डॉ. प्रदीप

देवघर : वतन के राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की 56 वीं पुण्यतिथि के अवसर पर ‘पारो की याद में’ काव्य-संकलन के कवि सह विवेकानंद शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा संस्थान के केंद्रीय अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव ने कहा- आज ही के दिन सन 1964 को मैथिलीशरण जी की मृत्यु हुई थी। उनका जन्म 3 अगस्त सन 1886 ई. में पिता सेठ रामचरण कनकने और माता कौशिल्या बाई की तीसरी संतान के रुप में उत्तर प्रदेश में झांसी के पास चिरगांव में हुआ था। अपने पिता जी से ही प्रेरणा पाकर गुप्त जी बाल्यावस्था से काव्य साधना में लग गए। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई। कक्षा नौ तक इन्होने अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त की फिर पढ़ना छोड़कर घर पर ही अध्ययन करने लगे। आचार्य महाबीर प्रसाद द्विवेदी के संपर्क में आकर इन्होने काव्य रचना प्रारम्भ की। वे बड़े विनम्र, सरल तथा स्वाभिमानी थे। इनके अध्ययन, इनकी कविता एवं राष्ट्र के प्रति प्रेम भावना ने इन्हें बहुत उच्च स्थान प्रदान कराया। हिन्दी कविता के इतिहास में उनका यह सबसे बड़ा योगदान है।

पवित्रता, नैतिकता और परंपरागत मानवीय सम्बन्धों की रक्षा उनके काव्य के प्रथम गुण हैं, जो पंचवटी से लेकरजयद्रथ वध, यशोधरा और साकेत तक में प्रतिष्ठित एवं प्रतिफलित हुए हैं। साकेत उनकी रचना का सर्वोच्च शिखर है। उनकी कवितायें खड़ी बोली में मासिक “सरस्वती” में प्रकाशित होना प्रारम्भ हो गई। उनका प्रथम काव्य संग्रह “रंग में भंग’ तथा वाद में “जयद्रथ वध प्रकाशित हुई। उन्होंने बंगाली के काव्य ग्रन्थ “मेघनाथ वध”, “ब्रजांगना” का अनुवाद भी किया। सन् 1914 ई. में राष्टीय भावनाओं से ओत-प्रोत “भारत भारती” का प्रकाशन किया। उनकी लोकप्रियता सर्वत्र फैल गई। सन 1931 के लगभग वे राष्ट्रपिता गांधी जी के निकट सम्पर्क में आये। ‘यशोधरा’ सन् 1932 ई. में लिखी। गांधी जी ने उन्हें “राष्टकवि” की संज्ञा प्रदान की। सन् 1941 ई. में व्यक्तिगत सत्याग्रह के अंतर्गत जेल गये। आगरा विश्वविद्यालय से उन्हें डी.लिट. से सम्मानित किया गया। वे 1952-1964 तक राज्यसभा के सदस्य मनोनीत हुये। सन् 1953 ई. में भारत सरकार ने उन्हें “पद्म विभूषण’ एवं 1954 में पद्म भूषण से सम्मानित किया।

उनकी प्रमुख रचनाएं निम्नलिखित हैं- महाकाव्य: साकेत, पंचवटी, किसान, काबा और कर्बला, रंग में भंग; खंड काव्य: जयद्रथ वध, भारत भारती, यशोधरा, सिद्धराज, हिन्दू, शकुन्तला, नहुष, द्वापर, बापू, , अजित, अर्जन और विसर्जन, अंजलि और अर्ध्य कुणाल गीत, गुरु तेग बहादुर, गुरुकुल, जय भारत, झंकार, पृथ्वीपुत्र, मेघनाद वध आदि; अनूदित- मेघनाथ वध, वीरांगना, स्वप्न वासवदत्ता, रत्नावली, रूबाइयात उमर खय्याम आदि, नाटक के रूप में भंग, राजा-प्रजा, वन वैभव, विकट भट, विरहिणी व्रजांगना, वैतालिक, शक्ति, सैरन्ध्री, स्वदेश संगीत, हिडिम्बा, हिन्दू आदि । उन्होंने 5 मौलिक नाटक लिखे हैं- ‘अनघ’, ‘चन्द्रहास’, ‘तिलोत्तमा’, ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’ और ‘विसर्जन’ । उन्होने भास के चार नाटकों- ‘स्वप्नवासवदत्ता’, ‘प्रतिमा’, ‘अभिषेक’, ‘अविमारक’ का अनुवाद किया है।

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