• वर्तमान परिस्थिति में आरक्षण की सीमा 50% से बढ़ाना आवश्यक है
  • जातीय जनगणना कराने की अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी से केंद्र झाड़ रही है अपना पल्ला
  • नीतीश जी ने अपने सीमित संसाधनों के बावजूद प्रदेश में जातीय गणना कराने पर शुरू किया काम

 

पटना। प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा ने भाजपा नेता सुशील मोदी के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि वो अपना मानसिक संतुलन खो चुके हैं और भाजपा की विफलताओं को छुपाने के लिए अनाप- शनाप बयानबाजी करते रहते हैं। उनकी बातों का तो अब उनकी पार्टी भी नोटिस नहीं लेती। प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि जातीय जनगणना कराने की बिहार से हुयी सर्वदलीय मांग को संवैधानिक दायित्व के बावजूद जब केंद्र सरकार ने ठुकरा दिया तो हमारे नेता नीतीश कुमार ने अपने सीमित संसाधनों के बावजूद प्रदेश में जातीय गणना कराने का निर्णय लेते हुए उसपर काम शुरू कर दिया है। क्योंकि आरक्षण तभी प्रभावी हो सकता है जब विभिन्न जाति, धर्म, वर्ग के लोगों की वास्तविक संख्या के बारे में ठोस जानकारी हो। जातीय गणना का एकमात्र उद्देश्य समाज के सभी वर्गों के गरीब एवं पिछड़े व्यक्तियों को चिन्हित कर उनका उत्थान सुनिश्चित करना है। इसलिए जातीय जनगणना को अखिल भारतीय स्तर पर केंद्र सरकार द्वारा कराए जाने की आवश्यकता है।

 

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में ओबीसी, अति पिछड़ा वर्ग एवं अन्य लाभार्थियों को 1931 की जनगणना से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर आरक्षण प्राप्त हो रहा है जो सामाजिक न्याय के विपरीत है। संविधान की सातवीं अनुसूची में वर्णित केंद्र सूची के विषय संख्या 69 में जनगणना कराने की संवैधानिक जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है परंतु केंद्र सरकार अपने संवैधानिक जिम्मेदारियों से भी पल्ला झाड़ रही है। जबकि जदयू और हमारे सर्वमान्य नेता लंबे समय से जाति आधारित जनगणना की मांग करते रहे हैं ताकि समाज के सभी वर्गों के कमजोर व बंचित लोगों का पता चले एवं उनके लिए समुचित ढ़ंग से विकास योजनाओं का क्रियान्वयन हो।

 

उमेश कुशवाहा ने कहा कि हमारी मांग के बावजूद भाजपा जाति आधारित जनगणना इसलिए नहीं कराना चाहती क्योंकि उनकी राजनीति का आधार धार्मिक एवं सांप्रदायिक है। उसे डर है कि जातिय जनगणना कराने से उनका हिंदू वोट बैंक विभाजित हो जाएगा। जिससे वो सत्ता सुख से बेदखल हो जाएंगे। जबकि धार्मिक आधार पर मत प्राप्त करना निंदनीय है। जदयू सामाजिक एवं आर्थिक आधार पर आरक्षण की पक्षधर रही है। हम सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए दृढ़ संकल्पित हैं। समाज के कमजोर एवं पिछड़े वर्गों चाहे वह सामाजिक आधार पर हो या आर्थिक आधार पर उनके उत्थान से ही समतामूलक समाज की स्थापना हो सकती है। संविधान के भाग 4 में वर्णित नीति निर्देशक तत्व का उद्देश सामाजिक एवं आर्थिक न्याय की स्थापना करना है और आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाना उसी के अनुरूप है।

 

प्रदेश अध्यक्ष ने आगे कहा कि जहां तक आरक्षण के संदर्भ में निर्धारित 50% की सीमा का प्रश्न है इसे बदलने की आवश्यकता है। क्योंकि हो सकता है कि जिस समय यह निर्णय लिया गया हो सामाजिक परिस्थिति वही रही हो परंतु समाज गत्यात्मक है और समय के साथ इसमें परिवर्तन होते रहते हैं। परिवर्तित परिस्थितियों के अनुरूप आवश्यकतायें, अपेक्षायें एवं मांगें परिवर्तित होती रहती हैं। संविधान निमार्ताओं ने भी समाज के परिवर्तनीय परिस्थितियों को ध्यान रखकर ही संविधान में अनुच्छेद 368 को शामिल किया था। जिसके तहत समय-समय पर संविधान में आवश्यकतानुसार संशोधन होते रहते हैं। न्यायालय भी समय- समय पर अपने पूर्व के फैसले को आवश्यकतानुसार बदलती रही है, आज की परिस्थिति में आरक्षण की सीमा 50% से बढ़ाना आवश्यक है।

 

उमेश कुशवाहा ने कहा कि भाजपा को जनता के विकास से कोई लेना-देना नहीं है और इसी के तहत मानसिक रूप से विकृत उसके सुशील मोदी जैसे नेता उल्टे अनर्गल प्रलाप करते हैं। वो जाति आधारित गणना की मांग कराने वालों पर ही आरोप- प्रत्यारोप करते रहते हैं, पर जनता सब जानती समझती है और केंद्र सरकार को इसका जवाब पुरे देश और बिहार के लोगों को देना ही होगा क्योंकि जाति आधारित जनगणना से ही सामाजिक न्याय एवं विकास संभव है। दूसरी ओर पिछड़ों, अति पिछड़ों, अल्पसंख्यकों एवं कमजोर वर्ग के विरोध की मानसिकता के तहत आरएसएस की एक एजेंसी के रूप में कार्य करने वाली भाजपा आरक्षण की विरोधी है। आने वाले चुनाव में जनता भाजपा को सबक सिखाएगी।

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