• रगालिया पंचायत के आदिवासी बहुल गांव स्थित 69 वर्ष पुराने सरकारी विद्यालय का कर दिया गया दूर के विद्यालय के साथ विलय
  • देढ़ से दो किलोमीटर दूर के विद्यालयों में पाथरचला विधालय का विलय करने से बच्चे शिक्षा के अधिकार से वंचित
  • शिक्षा विभाग की नयी नीति से पाथरचला गांव के बच्चे गाय चराने को विवश

रानीश्वर(दुमका)/ तूफान अंसारी: एक लंबे संघर्ष और कुर्बानी के बाद हमारा देश आजाद हुआ।आजाद भारत में सबको शिक्षा-सबको स्वास्थ्य,सब को रोजगार की बात की गई|चलिए आज बात करते हैं दुमका जिला के रानीश्वर प्रखंड अंतर्गत रांगालिया पंचायत के पाथरचला गांव के प्राथमिक विद्यालय की,जो अब बंद हो चुका है|हाल फिलहाल में झारखंड के 4700 प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालय बंद हो चुके है।ज्ञान विज्ञान समिति ने कोविड काल के बाद झारखंड की ऑनलाइन शिक्षा के प्रभाव का अध्ययन किया है और पाया कि 87% बच्चों के पास मोबाइल नहीं है।बच्चे ऑनलाइन शिक्षा कैसे प्राप्त करें। कोविड काल में सारे स्कूल बंद थे। कोविड काल में झारखंड के 5 जिलो के 15 प्रखंड के 100 पंचायतों में सामुदायिक शिक्षण केंद्र शुरू किया गया,नाम था खेत खलियान में शिक्षा।दुमका के रानीश्वर प्रखंड के 5 पंचायतों में 62 सामुदायिक शिक्षण केंद्र शुरू किए गए।देखा गया कि अनुसूचित जनजाति एवं अनुसूचित जाति बहुल क्षेत्र में अधिकतर स्कूल बंद कर दिए गए। कुछ चल भी रहे हैं तो सिर्फ एक पारा शिक्षक के द्वारा स्कूल चलाया जा रहा है।प्रगतिशील संगठन के आंदोलन के चलते शिक्षा अधिकार कानून 2009 लागू हुआ।इस कानून के माध्यम से 6 से 14 आयुवर्ग के बच्चो के लिए अनिवार्य शिक्षा लागू कर दी गई।लेकिन नयी नीति बनाकर स्कूलों का बंद होना इस कानून का उलंघन है। बताते चलें कि शिक्षा नीति 2020 पंचायतों में एक आधुनिक स्कूल की बात करती है।अर्थात धीरे धीरे गांवों के स्कूल बंद होगे।

 

ऐसे बंद स्कूलों को देखने और बंद होने के प्रभाव के अध्ययन के लिए प्रो डॉ डी के सेन और भारत ज्ञान समिति के राष्ट्रीय महासचिव डॉ काशी नाथ चटर्जी,प्रखंड कोऑर्डिनेटर पुरण चंद पाल,पंचायत कॉर्डिनेटर सामुदायिक शिक्षण केंद्र के संचालक जॉय सेन टुडू साथ इसका विस्तार से अध्ययन किया गया। आज हम बात करते हैं पहाड़ और जंगल के बीच स्थित पाथरचला गांव की जो रांगालिया पंचायत में स्थित है|यह गांव मुख्य सड़क मार्ग से 5 किलोमीटर दूर स्थित है|आजादी के सात दशकों बाद भी अबुआ दिशोम अबुआ राज में पक्के कच्चे संकीर्ण रास्ते से गुजरते हुए गांव पंहुचना पड़ता हैं । पाथरचाला गांव में 83 घर है।इस गांव में संथाल एवं मोहली निवास करते है।गांव के लोगों के साथ बंद हो चुके विद्यालय परिसर में ही ज्ञान विज्ञान समिति की टीम ने बैठक कर विधालय के बंद होने के कारण बच्चों पर इसका क्या असर पड़ रहा है इस बिषय पर विस्तार से चर्चा की। उस बैठक में लगभग 30-40 ग्रामीण शामिल हुए|बातचीत शुरू हुई सबसे पहले भुवन टुडू से जिन्होंने गांव के विद्यालय में 1953 में शिक्षा ग्रहण की थी।उन्होंने बताया कि 1953 में यह स्कूल झोपड़ी में चलता था।फिर गांव के लोगों ने जमीन उपलब्ध कराई और उनके सहयोग से स्कूल बनना शुरू हुआ। उस समय के शिक्षक का नाम भोलानाथ झा था| श्री टूडू ने इस विधालय में 10 वी तक शिक्षा ग्रहण की। उसके बाद कुछ दिनों तक सरकारी नौकरी भी की।1972 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा दी| 1977 में उन्हें कम्युनिटी हेल्थ वर्कर की नौकरी मिली, 1980 में उन्हें नौकरी से हटा दिया गया। उस समय वे गांव के सबसे पढ़े लिखे व्यक्ति थे। ज्ञात हो कि यहां के अधिकतर लोग खेती और पशुपालन का कार्य कर आजीविका चलाते हैं|

 

यहां किसी को भी सरकारी नौकरी नहीं है|हम आरक्षण-आरक्षण चिल्लाते हैं लेकिन जब आप गांव में जाते हैं तो आदिवासी समुदाय का आर्थिक रूप से पिछड़ा होना साफ दिखई पड़ता है। जब बातचीत शुरू हुई तो लोगों ने बताया कि 1953 से चलने वाला स्कूल अचानक बंद हो जाने से यहां के बच्चों की हालत बहुत बुरी है| यहां से पलाशपाड़ा गांव का प्राथमिक विद्यालय डेढ़ किलोमीटर दूर,हकिगतपुर का विद्यालय 2 किलोमीटर एवं जयपाहाड़ी का विद्यालय डेढ़ किलोमीटर दूर है जहां बच्चों को जंगल से होकर जाने में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए कुछ बच्चे इस गांव को छोड़कर पढ़ने के लिए रिश्तेदार यहां चले गए हैं कुछ बच्चों ने पढ़ना ही छोड़ दिया|इस दरम्यान दो बच्चों से मुलाकात हुई। जोशी मुर्मू और संतोष मुर्मू जो स्कूल बंद होने के बाद पढ़ाई छोड़ चुके हैं|उनके अभिभावकों से जब बात की तो उन्होंने बताया कि दूर के स्कूल में हमारे बच्चे नहीं जाना चाहते। अभी वे जोईसेन टुडू के सामुदायिक शिक्षण केंद्र में अध्ययनरत है।ग्रामीणों ने मिलकर निर्णय लिया है कि फिलहाल जॉय सेन के स्कूल में बच्चों को पढ़ाएंगे और सारे ग्रामीण स्कूल खोलने के लिए पंचायत स्तर पर धरना देंगे| अगर स्कूल नहीं खुला तो वे प्रखंड स्तर पर भी धरना देंगे। 1953 में स्थापित स्कूल का बंद होना दुर्भाग्यपूर्ण है।

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