फतेहपुर। फतेहपुर प्रखंड के जामजोरी साधु घराने की दुर्गा पूजा एक अनोखी मिसाल है। भारत भूमि ही एक ऐसा भूखंड है जहां 12 महीने में पूजा का सिलसिला जारी रहता है। फिरंगी के शासनकाल पूर्व से ही जामजोरी दुर्गा पूजा भक्तों द्वारा किए जाने का सिलसिला आज भी जारी है। आखिरकार साधु और राजघराने के संयुक्त उपनाम से एक प्रश्न उभर कर आ जाता है। अंग्रेजों के शासन के पूर्व भारत भूमि छोटे छोटे भूखंड में बटा हुआ था और छोटे राजा महाराजा के परिसीमन में अपना साम्राज्य चलाते थे जामजोरी भी उन्ही में से एक साम्राज्य है जिसमें खेतोरी का साम्राज्य हुआ करता था साम दाम दंड भेद नीति से खेतोंरी साम्राज्य का अंत कर साधु घराने ने अपना हुकूमत कायम किया था। साधु घराने का आखिरकार नाम कैसे पड़ा यहां साधु के अखाड़ा लगा रहता था।

 

 

जिसमें साधु संत दूरदराज से आकर विश्राम स्थल बना लिए थे जिनकी सेवा सत्कार से प्रसन्न होकर इस राजा घराने का नाम साधु उपनाम से नवाजा गया वही सिलसिला आज भी विद्यमान है साधु घराने के भक्त पुरुष राखल दास साधु को अक्सर मां दुर्गा स्वप्न में आती रहती थी। यहां के विशेष महत्त्व के आधार पर स्वप्न प्रदत कुत्ता काटने का दवाई दिया जाता है। एक तो साधु राजघराने की पूजा दुर्गा पूजा जहां 10 किलोमीटर की परिधि में लोग अपनी मन्नत पूरा करने या पूरा कराने मां के पास आते रहते हैं। भक्तों श्रद्धालुओं का यहां ताता लगा हुआ रहता है पहले छग बकरा भैंस आदि का बलि दिया जाता था। पर कुछ बरसो से बलि प्रथा अंत कर दिया गया एक बार की घटना है। रखलदास राजू को सपने में मां दुर्गा बताती है कि जलाशय जिसका नाम दिघी वह पानी की बहाव से टुट गया है।

 

 

राजा ने उठकर अपने प्रजा को बताया और जाकर देखा जलाशय टूट गया है। ऐसा ही सपना प्रदत दवाई कुत्ता के काटने वाले को दिया जाता है। उससे मेडिकल दवाई की जरूरत नहीं होती है। एवज में मां को अपनी इच्छा अनुसार चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है। जामजोरी साधु राजघराने के दुर्गा पूजा 10 किलोमीटर की करीडोर से भक्त और श्रद्धालुओं का जमावड़ा होते रहता है। इतिहास के पन्नों में दर्ज मां दुर्गा की पूजा स्थली में किस का मन नहीं होता एक बार आकर माथा टेके।

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