फिल्मों के साथ-साथ ए.के. हंगल को नाटक में भी अभिनय करने में सफलता प्राप्त हुई : डॉ. प्रदीप सिंह देव

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देवघर। आज सम्पूर्ण भारत में विशेषकर सिने करियर में ए. के. हंगल की जयंती मनाई जा रही है। आज ही के दिन 1 फरवरी, 1914 को हुआ था। मौके पर स्थानीय ओमसत्यम इंस्टीट्यूट आॅफ फिल्म, ड्रामा एंड फाइन आर्ट्स के निदेशक डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा- ए.के. हंगलह्ण उन अभिनेताओं में से एक थे जो अपने अभिनय के कारण मशहूर हुए। उन्होंने 26 अगस्त, 2012 की सुबह दुनिया को अलविदा कह दिया। पेशावर से करांची तक एके हंगल ने अपना बचपन बिताया और फिर हिन्दुस्तान के बंटवारे के समय 1949 में मुम्बई आ गए थे। एके हंगल ने बचपन से ही अपनी जिन्दगी में तमाम संघर्ष किए थे। उन्होंने अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद अपने बेटे विजय की परवरिश अकेले ही की थी। उनके बेटे विजय की भी पत्नी की मृत्यु 1994 में हो गई थी। उन्हें फिल्मों के साथ-साथ नाटक में भी अभिनय करने में सफलता प्राप्त हुई। वे 18 वर्ष के थे। जब उन्होंने नाटकों में अभिनय करने की शुरूआत की थी। नमक हराम, शोले और शौकीन जैसी फिल्मों में किए गए उनके अभिनय को हमेशा याद किया जाएगा। 1966 में आई फिल्म ह्यतेरी कसम से उन्होंने फिल्मों में अभिनय की शुरूआत की थी और उस समय एके हंगल की उम्र 52 वर्ष थी। 1977 में शोले और आइना जैसी फिल्मों ने उन्हें पहचान दिलाई। उन्होंने अवतार, कोरा कागज, शौकीन, बावर्ची जैसी मशहूर फिल्में की।

उन्हें 2006 में फिल्मों में अभिनय के लिए पद्म भूषण पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। वे अपने आप को कुछ बातों में बहुत खुशनसीब मानते थे जैसे कि उन्हें आजादी की लड़ाई में भाग लेने का अवसर मिला था और जिस कारण वे करांची की जेल में भी बंद रहे थे। उन्हें संगीत से बहुत गहरा प्यार था जिस कारण सन् 1993 में मुंबई में होने वाले पाकिस्तानी डिप्लोमैटिक फंक्शन में एके हंगल के हिस्सा लेने की वजह से शिव सेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे ने उनके वर्तमान और भविष्य दोनों ही फिल्मों पर रोक लगा दी थी। इसका असर उनकी फिल्मों पर भी पड़ा और करीब दो साल तक वे बेरोजगार रहे थे। निमार्ता-निर्देशक उन्हें अपनी फिल्मों मे रोल देने से कतराने लगे जिस कारण रूप की रानी चोरों का राजा, अपराधी जैसी कई फिल्मों से उनके किरदार निकाल दिए गए थे। वे ऐसे अभिनेता थे जिनके अभिनय को सराहने के लिए कुछ फिल्में ही काफी थीं पर एक बात का दुख शायद हमेशा रहेगा कि फिल्मों में दादा, पिता, चाचा जैसे अनेक चरित्र किरदार अदा करने वाले एके हंगल को अंतिम विदाई देने बस कुछ ही कलाकार पहुंचे लेकिन इंडस्ट्री का कोई भी बड़ा कलाकार उन्हें अंतिम विदाई देने नहीं पहुंचा। किसी ने सच ही कहा है कि गर्व से मरने वाले और अपनी तमाम जिन्दगी संघर्ष करने वाले लोगों की अंतिम विदाई किसी का इंतजार नहीं किया करती है।

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