राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी भारत के ही नहीं बल्कि संसार के महान पुरुष थे : डॉ. प्रदीप सिंह देव

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देवघर। भारत में शहीद दिवस हर साल 30 जनवरी एवं 23 मार्च को भारत की स्वतंत्रता, गौरव, कल्याण और प्रगति के लिए लड़ने वाले को श्रद्धांजलि देने के लिए मनाया जाता है। 30 जनवरी 1948 को ही महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। मौके पर स्थानीय विवेकानंद शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा संस्थान के केंद्रीय अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा- राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी भारत के ही नहीं बल्कि संसार के महान पुरुष थे। वे आज के इस युग की महान विभूति थे। महात्मा गाँधी जी सत्य और अहिंसा के अनन्य पुजारी थे और अहिंसा के प्रयोग से उन्होंने सालों से गुलाम भारत वर्ष को परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त करवाया था। विश्व में यह एकमात्र उदाहरण है कि गाँधी जी के सत्याग्रह के समक्ष अंग्रेजों को भी झुकना पड़ा। 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में गांधी जी का जन्म हुआ था। भारत को स्वतंत्रता दिलवाने में उन्होंने एहम भूमिका निभायी थी।

वे सत्य के पुजारी थे। उनका सम्पूर्ण नाम मोहनदास करमचंद गाँधी था। वे सत्य के पुजारी थे। उनके पिता का नाम करमचंद उत्तमचंद गाँधी था और वह राजकोट के दीवान रह चुके थे। उनकी माता का नाम पुतलीबाई था और वह धर्मिक विचाओं और नियमों का पालन करती थी। कस्तूरबा गांधी उनकी पत्नी का नाम था। वह उनसे 6 माह बड़ी थी। कस्तूरबा और गांधी जी के पिता मित्र थे। इसलिए उन्होंने अपनी दोस्ती को रिश्तेदारी में बदल दी। कस्तूरबा गाँधी ने हर आंदोलन में गांधी जी का सहयोग दिया था। उन्होंने अपनी शिक्षा पोरबंदर में की थी। फिर माध्यमिक परीक्षा के लिए राजकोट गए थे। फिर वह इंग्लैंड अपने वकालत की आगे की पढ़ाई पूरी करने के लिए इंग्लैंड चले गए। गाँधी जी ने 1891 में अपनी वकालत की शिक्षा पूरी की। लेकिन किसी कारण वश उन्हें अपने कानूनी केस के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा।

वहाँ जाकर उन्होंने रंग के चलते हो रहे भेद-भाव को महसूस किया और उसके खिलाफ अपनी आवाज उठाने की सोची। वहां के गोरे लोग काले लोगों पर जुल्म ढाते थे और उनके साथ दुर्व्यवहार करते थे। भारत वापस आने के बाद उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को तानाशाह का जवाब देने के लिए और अपने लिखे समाज को एकजुट करने के बारे में सोचा। इसी दौरान उन्होंने कई आंदोलन किये जिसके लिए वे कई बार जेल भी जा चुके थे। उन्होंने बिहार के चम्पारण जिले में जाकर किसानो पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की। यह आंदोलन उन्होंने जमींदार और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ी थी। एक बार उन्हें स्वयं एक गोरे ने ट्रेन से उठाकर बाहर फेंक दिया क्योंकि उस श्रेणी में केवल गोरे यात्रा करना अपना अधिकार समझते थे। परंतु वे उस श्रेणी में सवार कर रहे थे। उन्होंने तभी से प्रण लिया कि वह काले लोगों और भारतीयों के लिए संघर्ष करेंगे।

उन्होंने वहाँ रहने वाले भारतीयों के जीवन सुधार के लिए कई आन्दोलन किये। दक्षिण अफ्रीका में आन्दोलन के दौरान उन्हें सत्य और अहिंसा का महत्त्व समझ में आया। जब वह भारत वापस आए तब उन्होंने वही स्थिति यहीं पर देख जो वह दक्षिण अफ्रीका में देखकर आए थे। 1920 में उन्होंने सविनय अवज्ञा आन्दोलन चलाया और अंग्रेजों को ललकारा। उन्होंने असहयोग आन्दोलन की स्थापना की और 1942 में भारत उन्होंने अंग्रेजों से भारत छोड़ने का आह्वान किया। अपने इन आन्दोलन के दौरान वह कई बार जेल गए। हमारा भारत 1947 में आजाद हुआ पर दु:खू की बात यह है की नाथुरम गोडसे नामक व्यक्ति ने 30 जनवरी 1948 को गोली मारकर महात्मा गाँधी की हत्या कर दी। जब वह संध्या प्रार्थना के लिए जा रहे थे।

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