सहरसा : साल भर स्कूल में व्यस्त रहने वाले बच्चों को गर्मी की छुट्टियों में व्यस्त रखना हर अभिभावक के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होता है। खासकर न्यूक्लियर फैमिली में जहां माता-पिता दोनों काम में व्यस्त होते हैं बच्चे अक्सर अपना ज्यादातर समय मोबाइल पर बिताने लगते हैं, जो उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है। ऐसे में समर कैंप एक बेहतरीन विकल्प है जहां बच्चे ना सिर्फ मोबाइल से दूर अपना ज्यादातर समय खेल, योग और अन्य शारीरिक गतिविधियां करते हुए बिताते हैं बल्कि अब समर कैंप में बच्चों को अच्छा व्यवहार करने से लेकर गुड टच और बैड टच में अंतर करना भी सीख रहे हैं। टॉपर स्टडी पॉइंट उड़ान की संस्थापिका व समाजसेवी सरिता राय बताती है कि इन दिनों ज्यादातर अभिभावक बच्चों के लम्बे समय तक मोबाइल इस्तेमाल करने की आदत से परेशान है इसलिए हमने समर कैंप में इस तरह की एक्टिविटीज प्लान की है जो ना सिर्फ गर्मी की छुट्टियों में बच्चों को व्यस्त रखेगी बल्कि उनमें जीवन भर काम आने वाली अच्छी आदतें भी विकसित करेगी।

यहां उन्हें अलग-अलग खेलों के साथ ही आर्ट एंड क्राफ्ट, योग और ध्यान भी करवाया जाता है। न्यूक्लियर फैमिली में रहने वाले बच्चों को कुकिंग जैसे बेसिक लाइफ स्किल सिखाने के लिए फायर लेस कुकिंग की स्पेशल क्लास होती है। इतना ही नहीं हम उन्हें नैतिक मूल्य, अच्छा व्यवहार करना और बड़ों की इज्जत करना भी सिखाते हैं। बच्चों को जीव-जंतुओं और पर्यावरण के प्रति जागरूक बनाने के लिए हम उन्हें प्रकृति से जोड़ते हैं और पुराने सामान को रीसायकल कर कुछ नई उपयोगी वस्तुएं बनाना भी सीखा रहे हैं। सभी एक्टिविटीज को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि बच्चे गर्मी की छुट्टियां खत्म होने से पहले यह सभी लाइफ स्किल सीख जाएं। गुड टच और बैड टच में अंतर जानना है जरुरी:- बच्चों के साथ यौन अपराधों के बढ़ते मामलों को देखते हुए उन्हें गुड टच और बैड टच में अंतर बताना भी बहुत जरुरी हो गया है पर अक्सर अभिभावकों को समझ नहीं आता है कि छोटे बच्चों को यह कैसे समझाया जाए। एक बड़े सर्वे के मुताबिक कई बार नजदीकी रिश्तेदार या फैमिली फ्रेंड ही बच्चों के साथ गलत व्यवहार कर रहे होते हैं जिसे बच्चे समझ नहीं पाते हैं। टॉपर स्टडी पॉइंट उड़ान की संस्थापिका व समाजसेवी सरिता राय कहती है कि हम उन्हें समर कैंप में ही गुड टच और बैड टच में अंतर समझाते हैं। बेसिक सेल्फ डिफेंस भी सिखाते हैं ताकि वक्त आने पर बच्चे मदद मिलने तक अपनी देखभाल खुद कर पाएं।

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